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हाल ही में इस्लामिक आतंकवादियों ने नागपुर में जो हिंसा का नंगा नाच किया और जिस तरह इस्लामिक आक्रांता औरंगजेब का समर्थन किया वो अप्रत्याशित नहीं था। वास्तविकता तो ये है कि भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक इस्लामिक आतंकवाद का एक सुनिश्चित पैटर्न है जिसे बार-बार दोहराया जाता है और जिसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस जैसी ‘जातिवादी इस्लामिक सांप्रदायिक’ (जाइसा) पार्टियां अंधा समर्थन और कवर फायर देती हैं।

इस्लामिक आतंकवादी और उनके राजनीतिक आकाओं का नेटवर्क और सूचना-संचार तंत्र इतना सुदृढ़ हो चुका है कि अब ये किसी भी नगण्य या अनावश्यक विषय को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित-प्रसारित कर सकते हैं और किसी भी झूठे मुद्दे को सच बना कर प्रस्तुत कर सकते हैं। चाहे राम मंदिर का मामला हो या सीएए-एनआरसी का, पूरे विश्व ने देखा कि इन्होंने कैसे झूठ फैलाया और मुसलमानों का भड़काया।

अगर सच कहा जाए तो तो ये कहना गलत होगा कि किसी ने मुसलमानों को भड़काया, वास्तविकता तो ये हैं कि हिंदू नफरत में आकंठ डूबा भारत का औसत मुसलमान वैसे ही देश में हिंसा के लिए तैयार बैठा है। कांग्रेस और इसके जैसी दूसरी जाइसा पार्टियां तो इन्हें सिर्फ अपनी नफरत और भड़ास निकालने का मौका देती हैं जिसका ये भरपूर फायदा उठाते हैं। ये वास्तविकता है कि देश के बंटवारे से पहले जिन मुसलमानों ने मौहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग को खुले दिल से समर्थन दिया, उनमें से अधिकांश तो पाकिस्तान गए ही नहीं। इन्होंने कभी भारत को खुले और सच्चे दिल से स्वीकार नहीं किया। इनका दिल अब भी पाकिस्तान के लिए धड़कता है, भले ही वो बदनसीब आतंकी मुल्क आज कितनी ही परेशानियां झेल रहा हो और भले ही वहां के नागरिक भूखों मरने का मजबूर हों।

चाहे दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया में सीएए विरोधी दंगे हों, शाहीन बाग के धरने-प्रदर्शन हों, उत्तर पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे हो या जहांगीर पुरी के दंगे, इस वर्ग की हिंदुओं से नफरत बड़े पैमाने पर बार-बार सामने आती है। उत्तर प्रदेश में संभल में हरिहर मंदिर तोड़ कर बनाई गई विवादित मस्जिद का मामला हो यो चैंपियंस ट्रॉफी जीतने के उपलक्ष्य में मध्य प्रदेश के मऊ में निकाली गई विजय यात्रा पर हमले का मामला, ये बार-बार स्पष्ट हो गया है कि ये वर्ग हिंदू नफरत के जहर में आकंठ डूबा है और इसे हिंदुओं की ही नहीं, भारत की तरक्की से भी परेशानी है। इस तबके के लिए लोकतंत्र और राजनीतिक मर्यदाओं का कोई मतलब नहीं है। ये कट्टरपंथी धर्मांध वर्ग सिफ उन्हीं हिंदू विरोधी इस्लामिक पार्टियों का समर्थन करता है जो इसकी सभी नाजायज मांगों को मानने के लिए तैयार हों।

देश के बंटवारे से लेकर सीएए-एनआरसी, विवादित मस्जिदों से लेकर हिंदुओं के हत्यारे मुगलों के समर्थन तक, मुद्दा कोई भी हो, ये वर्ग बार-बार हिंसा पर उतारू होता रहा है। अब मुस्लिम धर्म गुरू इन्हें वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ सड़कों पर उतारने और खून-खराबा करवाने के लिए तैयार कर रहे हैं। यहां जानबूझ कर ये नहीं कहा गया कि कोई इन्हें ‘उकसा’ रहा है क्योंकि देश का इतिहास गवाह है कि हिंदुओं की नफरत में डूबे इस वर्ग को उकसाने की कोई आवश्यकता नहीं है। ये तो पहले से ही तैयार बैठे हैं।

अब एक बहुत महत्वपूर्ण विषय इनकी सदाबहार तैयारी का भी है। सोचने की बात है कि मुसलमान अचानक कैसे सैकड़ों की संख्या में एकत्र हो जाते हैं और कैसे इनके पास हथियार, बंदूकें, पत्थर, पेट्रोल बम इत्यादि आ जाते हैं, कैसे ये टोपी और नकाब के पीछे छुपकर पुलिस और हिंदुओं पर हमले करते हैं। अब तो इनके पास सोशल मीडिया का भी संबल है। ये हिंदुओं और भारत के विरूद्ध द्वेष फैलाने के लिए इनका भी प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं।

कहना न होगा मुस्लिम बहुल इलाके भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा और शांति के लिए चुनौती बन गए हैं। ये इलाके देश की सुरक्षा के लिए उतनी ही गंभीर चुनौती हैं जितने नक्सल प्रभावित क्षेत्र। यदि भारत को बार-बार होने वाले दंगों की आग से बचाना है तो इन इलाकों की सतत निगरानी और हरेक घर ही जांच के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनानी होगी। ये इलाके सोशल मीडिया और अन्य संचार माध्यमों से भारत विरोधी मुस्लिम आतंकी देशों से भी सीधे-सीधे जुड़े हैं। जब भी ये दंगे करते हैं इन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे हिंदू विरोधी देशों से सीधा समर्थन मिलता है जो हिंसा की आग में घी डालने का काम बढ़-चढ़ कर करते हैं। इनके सोशल मीडिया खातों पर भी निगाह रखने की बहुत आवश्यकता है और इस विषय में कानूनों में तुरंत संशोधन भी होने चाहिए।

भारत में रक्षा विशेषज्ञ बार-बार टू एंड हाफ फ्रंट वॉर की बात करते हैं जिससे उनका आशय पाकिस्तान, चीन और भारत में बैठे उनके पिट्ठुओं से होता है। ध्यान रहे अब बांग्लादेश भी इस जमात में शामिल हो गया है। अब ये थ्री एंड हाफ फ्रंट वॉर हो गई है। समझने की बात ये है कि ये जो ‘हाफ’ है वो असल में बाकि तीन से भी अधिक खतरनाक है। इसमें मुस्लिम परस्त राजनीतिक दल, गैर सरकारी संगठन और अंतरराष्ट्रीय वामी-इस्लामी नापाक गठजोड़ के देसी प्रतिनिधि आदि शामिल हैं। ये लोकतंत्र के नाम पर इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। वास्तव में ये खुद पहले हमला करते हैं और फिर ‘इस्लामो फोबिया’ और ‘मुसलमानों को सताए जाने’ का नैरेटिव बनाते हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की सुरक्षा से समझौता करते हुए अब तक इन्हें असीमित ढील दी है। अब इस भारत और हिंदू विरोधी गिरोह को समूल नष्ट करने का समय आ गया है। सांप्रदायिक दंगों की आड़ में देश की अखंडता, सुरक्षा को जोखिम में डालने वाले इस गैंग को अधिक ढील देना घातक होगा। इनसे सिर्फ कानूनों और मुकदमों के माध्यम से नहीं निपटा जा सकता। इतिहास गवाह है कि ये ताकतें देश में बार-बार दंगे करवाती हैं फिर मुकदमे दसियों साल तक चलते हैं और अंत मे ंतो ज्यादातर अपराधी किसी न किसी कारण से छूट जाते हैं। सबसे गंभीर बात तो ये हैं कि इन दंगों के बाद मास्टरमाइंड हमेशा सुरक्षित रहते हैं और सामने दिखने वाले कुछ दंगाई ही पकड़े जाते हैं। अब आवश्यक है कि सरकार दंगों से निपटने के लिए अलग से कानून बनाए और सामने दिखाई देने वाले दंगाईयों से पहले मास्टरमाइंड को गिरफ्तार करे।

रामहित नंदन, वरिष्ठ पत्रकार

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