गर्भपात कानून में संशोधन हो, रेप पीड़ितों की \'गरिमा\' का सम्मान जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली: देश में रेप पीड़िताओं के अधिकार और गर्भपात कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि रेप से जुड़ी गर्भावस्थाओं में समय सीमा जैसी कानूनी बाधाओं को हटाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने दो टूक कहा कि कानून का मकसद पीड़िता को राहत देना है, न कि उसे और पीड़ा में धकेलना।
यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब एम्स ने एक क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर कोर्ट से अपने ही फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। इससे पहले अदालत ने 15 साल की रेप पीड़िता की 30 हफ्ते से अधिक की गर्भावस्था को खत्म करने की अनुमति दी थी, जिसे AIIMS ने मेडिकल आधार पर चुनौती दी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद संवेदनशील रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि 'कानून को समय के साथ बदलना होगा' और रेप पीड़िताओं के मामलों में तय समय सीमा को खत्म करने पर विचार जरूरी है, ताकि न्याय और मानवीय दृष्टिकोण दोनों कायम रह सकें।
अदालत की भावुक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा, 'सोचिए, वह एक बच्ची है… उसे इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं।' कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी हाल में नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उसके मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा असर डालता है।
AIIMS की ओर से पेश रिपोर्ट में क्या है?
AIIMS की ओर से पेश रिपोर्ट में कहा गया कि 30 हफ्ते में गर्भपात कराने पर बच्चे के जीवित जन्म लेने और गंभीर शारीरिक विकृतियों की आशंका है। साथ ही, यह प्रक्रिया नाबालिग के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हो सकती है, जिससे भविष्य में उसकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होने का जोखिम है। डॉक्टरों ने सुझाव दिया कि कुछ और हफ्तों तक गर्भ जारी रखने से बच्चे के बचने की संभावना बढ़ सकती है।
'अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए'
हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों पर संतुलित लेकिन स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके माता-पिता का होना चाहिए, न कि किसी संस्था या राज्य का। अदालत ने निर्देश दिया कि परिवार को सभी मेडिकल तथ्यों की पूरी जानकारी देकर काउंसलिंग की जाए, जिसके बाद उनकी इच्छा के आधार पर आगे का कदम तय होगा। जस्टिस बागची ने भी कहा कि 'राज्य और नागरिक के बीच टकराव नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़िता के अधिकारों का सम्मान ही सर्वोच्च होना चाहिए।'