विपक्षी दलों में बगावत से बदला संसद का गणित, परिसीमन बिल पास कराने से अब कुछ ही वोट दूर एनडीए
देश की राजनीति ने पिछले दो हफ्तों में एक ऐसा नया मोड़ ले लिया है जिसकी उम्मीद एक महीने पहले तक किसी को नहीं थी। इस पूरे राजनीतिक बदलाव का सबसे बड़ा असर संसद के आगामी मानसून सत्र में देखने को मिल सकता है, जहां सरकार एक बार फिर महिलाओं के आरक्षण पैकेज से जुड़े संविधान संशोधन और परिसीमन बिल को पास कराने की तैयारी में है।
बता दें कि इसी साल अप्रैल के महीने में एकजुट विपक्ष के चलते लोकसभा में यह अहम बिल मात्र 54 वोटों की कमी की वजह से गिर गया था, लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं और अगर यह बिल दोबारा संसद में आता है तो इसके पास होने की संभावना तेज हो गई है।
बता दें कि इसी साल अप्रैल के महीने में एकजुट विपक्ष के चलते लोकसभा में यह अहम बिल मात्र 54 वोटों की कमी की वजह से गिर गया था, लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं और अगर यह बिल दोबारा संसद में आता है तो इसके पास होने की संभावना तेज हो गई है।
समझिए बिल के पास होने की संभावना क्यों?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि इस बड़े बदलाव की मुख्य वजह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में हुई ऐतिहासिक बगावत और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना में मंडराते संकट को माना जा रहा है। बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी हर स्तर पर बिखर रही है और संसद में इसका सबसे बड़ा असर दिखा है।
तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत करते हुए अपना एक अलग गुट बना लिया है और वे एक नई पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं, जो अब सीधे तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनने जा रही है।
उद्धव गुट का हाल भी बेहाल, समझिए कैसे?
दूसरी ओर बंगाल की राजनीति की तरह ही महाराष्ट्र की राजनीति में भी ऐसी बगावती ऊहापोह देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की पार्टी के नौ सांसदों में से छह सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ जाने की तैयारी में हैं।
एनडीए सरकार को कैसे मिलेगा फायदा?
ऐसे में एक तरफ टीएमसी के सांसद और दूसरी ओर उद्धव गुट के सांसदों का विखराव और बगावत देखने को मिलेगा तो यह कहना थोड़ा भी गलत नहीं होगा कि इन तमाम सियासी उलटफेर का सीधा फायदा केंद्र की सत्ताधारी एनडीए सरकार को मिल सकता है, जो मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच सकती है।
अब समझिए लोकसभा का गणित
अब इस सियासी उठा-पटक के बीच लोकसभा के गणित को समझें तो कुल 543 सीटों में से दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सदस्यों का समर्थन जरूरी है, क्योंकि 3 सीटें फिलहाल खाली हैं। ऐसे में इस समय तृणमूल के बागी सांसदों को मिलाकर एनडीए के पास कुल 318 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 184 और गैर-गठबंधन दलों के पास 38 सांसद मौजूद हैं।
नियम के मुताबिक बिल पास होने के लिए सदन में वोटिंग के वक्त मौजूद सांसदों की संख्या मायने रखती है और पिछले अनुभवों के आधार पर देखें तो सरकार को दो-तिहाई का आंकड़ा छूने के लिए 54 और वोटों की जरूरत थी।
बहुमत के कितने नजदीक, कैसे हासिल कर सकती है?
देखा जाए तो अब इस जादुई आंकड़े को हासिल करना सरकार के लिए बहुत आसान हो गया है, क्योंकि तृणमूल के 20 बागी और उद्धव गुट के 6 संभावित बागी सांसदों के आने से यह कमी घटकर सिर्फ 28 वोटों की रह जाएगी। इसके अलावा एक और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम यह हुआ है कि तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके का कांग्रेस से नाता टूट चुका है और वह विपक्षी इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार और डीएमके के बीच बातचीत चल रही है और अगर डीएमके की मांगें मान ली जाती हैं, तो उसके 22 सांसदों के समर्थन के साथ एनडीए का आंकड़ा 348 तक पहुंच जाएगा, जिसके बाद उसे बहुमत के लिए केवल छह और वोटों की दरकार होगी।
छह वोटों के लिए भाजपा की रणनीति क्या हो सकती है?
चूंकि बचे संभावित 6 वोटों के लिए केंद्र की एनडीए सरकार की रणनीति अहम मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों और उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों के मुताबिक इस आखिरी 6 वोटों की कमी को पूरा करने के लिए भाजपा की नजर विपक्षी गठबंधन की कुछ बेहद छोटी पार्टियों पर है, जिनमें महाराष्ट्र की एक क्षेत्रीय पार्टी भी शामिल है।
अब राज्यसभा का अंक गणित भी समझिए
वहीं दूसरी ओर राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 वोटों की जरूरत है और एनडीए के पास अभी 150 सांसद हैं। अगर यहां भी डीएमके के 8 सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो यह आंकड़ा 158 हो जाएगा और वहां भी सरकार बहुमत से सिर्फ छह वोट दूर रह जाएगी, जिसे तृणमूल सांसदों के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों पर उपचुनाव और अन्य छोटे दलों के सहयोग से आसानी से हासिल किया जा सकता है।
कुल मिलाकर यदि केंद्र सरकार संसद के दोनों सदनों में यह जादुई आंकड़ा जुटाने में कामयाब रहती है, तो आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की न सिर्फ धमाकेदार वापसी होगी बल्कि देश में 'एक देश एक चुनाव' जैसे बड़े और कड़े कानूनों को लागू करने का रास्ता भी पूरी तरह साफ हो जाएगा।
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि इस बड़े बदलाव की मुख्य वजह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में हुई ऐतिहासिक बगावत और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना में मंडराते संकट को माना जा रहा है। बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी हर स्तर पर बिखर रही है और संसद में इसका सबसे बड़ा असर दिखा है।
तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत करते हुए अपना एक अलग गुट बना लिया है और वे एक नई पार्टी 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं, जो अब सीधे तौर पर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा बनने जा रही है।
उद्धव गुट का हाल भी बेहाल, समझिए कैसे?
दूसरी ओर बंगाल की राजनीति की तरह ही महाराष्ट्र की राजनीति में भी ऐसी बगावती ऊहापोह देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र में भी उद्धव ठाकरे की पार्टी के नौ सांसदों में से छह सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ जाने की तैयारी में हैं।
एनडीए सरकार को कैसे मिलेगा फायदा?
ऐसे में एक तरफ टीएमसी के सांसद और दूसरी ओर उद्धव गुट के सांसदों का विखराव और बगावत देखने को मिलेगा तो यह कहना थोड़ा भी गलत नहीं होगा कि इन तमाम सियासी उलटफेर का सीधा फायदा केंद्र की सत्ताधारी एनडीए सरकार को मिल सकता है, जो मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही संविधान संशोधन बिल पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच सकती है।
अब समझिए लोकसभा का गणित
अब इस सियासी उठा-पटक के बीच लोकसभा के गणित को समझें तो कुल 543 सीटों में से दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सदस्यों का समर्थन जरूरी है, क्योंकि 3 सीटें फिलहाल खाली हैं। ऐसे में इस समय तृणमूल के बागी सांसदों को मिलाकर एनडीए के पास कुल 318 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 184 और गैर-गठबंधन दलों के पास 38 सांसद मौजूद हैं।
नियम के मुताबिक बिल पास होने के लिए सदन में वोटिंग के वक्त मौजूद सांसदों की संख्या मायने रखती है और पिछले अनुभवों के आधार पर देखें तो सरकार को दो-तिहाई का आंकड़ा छूने के लिए 54 और वोटों की जरूरत थी।
बहुमत के कितने नजदीक, कैसे हासिल कर सकती है?
देखा जाए तो अब इस जादुई आंकड़े को हासिल करना सरकार के लिए बहुत आसान हो गया है, क्योंकि तृणमूल के 20 बागी और उद्धव गुट के 6 संभावित बागी सांसदों के आने से यह कमी घटकर सिर्फ 28 वोटों की रह जाएगी। इसके अलावा एक और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम यह हुआ है कि तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके का कांग्रेस से नाता टूट चुका है और वह विपक्षी इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार और डीएमके के बीच बातचीत चल रही है और अगर डीएमके की मांगें मान ली जाती हैं, तो उसके 22 सांसदों के समर्थन के साथ एनडीए का आंकड़ा 348 तक पहुंच जाएगा, जिसके बाद उसे बहुमत के लिए केवल छह और वोटों की दरकार होगी।
छह वोटों के लिए भाजपा की रणनीति क्या हो सकती है?
चूंकि बचे संभावित 6 वोटों के लिए केंद्र की एनडीए सरकार की रणनीति अहम मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों और उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के बयानों के मुताबिक इस आखिरी 6 वोटों की कमी को पूरा करने के लिए भाजपा की नजर विपक्षी गठबंधन की कुछ बेहद छोटी पार्टियों पर है, जिनमें महाराष्ट्र की एक क्षेत्रीय पार्टी भी शामिल है।
अब राज्यसभा का अंक गणित भी समझिए
वहीं दूसरी ओर राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 वोटों की जरूरत है और एनडीए के पास अभी 150 सांसद हैं। अगर यहां भी डीएमके के 8 सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो यह आंकड़ा 158 हो जाएगा और वहां भी सरकार बहुमत से सिर्फ छह वोट दूर रह जाएगी, जिसे तृणमूल सांसदों के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीटों पर उपचुनाव और अन्य छोटे दलों के सहयोग से आसानी से हासिल किया जा सकता है।
कुल मिलाकर यदि केंद्र सरकार संसद के दोनों सदनों में यह जादुई आंकड़ा जुटाने में कामयाब रहती है, तो आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की न सिर्फ धमाकेदार वापसी होगी बल्कि देश में 'एक देश एक चुनाव' जैसे बड़े और कड़े कानूनों को लागू करने का रास्ता भी पूरी तरह साफ हो जाएगा।